कुछ गीत गुनगुनाइए प्रतीत तो हो
अस्तित्व प्रश्नचिन्हित कोई गीत तो हो
जीवंतता केवल श्वासों का नहीं सरगम
सुगंधता कर्मों का श्वास मिश्रण रहे हरदम
एक धुन, एक लय का मोहक मीत तो हो
अस्तित्व प्रश्नचिन्हित कोई गीत तो हो
हर क्षेत्र के यहां हैं विभिन्न उन्नत धुरंधर
हर नेत्र में बसा है नए लक्ष्य का समुंदर
कुछ करना ऐसा समाज की नई रीत तो हो
अस्तित्व प्रश्नचिन्हित कोई गीत तो हो
सहजता से कहीं रहना अकर्मण्यता लगे
पलकें खुलीं हों जिसकी क्या हैं वह जगे
आकर्षक हो, अनूठा हो जगी प्रीत तो हो
अस्तित्व प्रश्नचिन्हित कोई गीत तो हो।
धीरेन्द्र सिंह
28.07.2026
13.33
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें