भावनाओं के पुष्पों से, हर मन है सिजता
अभिव्यक्ति की डोर पर, हर मन है निजता
शब्दों की अमराई में, भावों की तरूणाई है
दिल की लिखी रूबाई में,एक तड़पन है निज़ता।
भावनाओं के पुष्पों से, हर मन है सिजता
अभिव्यक्ति की डोर पर, हर मन है निजता
शब्दों की अमराई में, भावों की तरूणाई है
दिल की लिखी रूबाई में,एक तड़पन है निज़ता।
Nijatata काव्य
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शनिवार, 9 मई 2026
मनमर्जियाँ
मनोभाव की होती हैं नित कितनी सरगर्मियां निभाव में हो पाती हैं कितनी सी मनमर्जियाँ
टुकड़े-टुकड़े, गिरते-पड़ते कुछ भाव कह दिए सामनेवाला कितना समझा उतने में रह लिए होती जो बारिश की झूमती बूंदों सी खुदगर्जियाँ निभाव में हो पाती हैं कितनी सी मनमर्जियाँ
कुछ कह दिए कुछ रोक लिए रोज ऐसा होता उगता नहीं हमेशा भाव बीज जैसा है बोता तोता सा वही रट अटक-मटक-झटक अर्जियां निभाव में हो पाती है कितनी सी मनमर्जियाँ
व्यक्तिगत जीवन हो या किसी समूह की धरती मनोभाव कितने बरसे पर लगे धरती है परती डुबो न संग किसी गहरे भाव सागर में दरमियां निभाव में हो पाती हैं कितनी सी मनमर्जियाँ।
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