भावनाओं के पुष्पों से, हर मन है सिजता
अभिव्यक्ति की डोर पर, हर मन है निजता
शब्दों की अमराई में, भावों की तरूणाई है
दिल की लिखी रूबाई में,एक तड़पन है निज़ता।
भावनाओं के पुष्पों से, हर मन है सिजता
अभिव्यक्ति की डोर पर, हर मन है निजता
शब्दों की अमराई में, भावों की तरूणाई है
दिल की लिखी रूबाई में,एक तड़पन है निज़ता।
इन पंक्तियों ने मुझे ठहरकर सोचने पर मजबूर किया। आप बड़े सीधे ढंग से अस्तित्व और निजत्व की टकराहट दिखाते हैं। अकेलापन यहाँ कमजोरी नहीं, बल्कि चेतना की आवाज़ बन जाता है। प्रेम में जब सवाल कठिन होते हैं, तब आप संवाद को ही रास्ता बताते हैं, और यह बात बहुत सटीक लगती है।
इन पंक्तियों ने मुझे ठहरकर सोचने पर मजबूर किया। आप बड़े सीधे ढंग से अस्तित्व और निजत्व की टकराहट दिखाते हैं। अकेलापन यहाँ कमजोरी नहीं, बल्कि चेतना की आवाज़ बन जाता है। प्रेम में जब सवाल कठिन होते हैं, तब आप संवाद को ही रास्ता बताते हैं, और यह बात बहुत सटीक लगती है।
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