भावनाओं के पुष्पों से, हर मन है सिजता
अभिव्यक्ति की डोर पर, हर मन है निजता
शब्दों की अमराई में, भावों की तरूणाई है
दिल की लिखी रूबाई में,एक तड़पन है निज़ता।
भावनाओं के पुष्पों से, हर मन है सिजता
अभिव्यक्ति की डोर पर, हर मन है निजता
शब्दों की अमराई में, भावों की तरूणाई है
दिल की लिखी रूबाई में,एक तड़पन है निज़ता।
Nijatata काव्य
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गुरुवार, 23 जुलाई 2026
निर्मुक्त हो जीवन
आस जब तुम्हारी है प्यास जब तुम्हारी है कहो क्यों न करूँ मैं फिर तुम्हारी अर्चना सृष्टि जब दुलारी है दृष्टि की जब लयकारी है कहो क्यों न हृदय तब करे मुग्धित गर्जना
शक्ति की सब करें अर्चना अद्भुत है सर्जना पुष्प, दीप यही सब सीख क्यों नही हो कामना ध्यान का ही गान चलता जीवन है इसमें पलता कहो क्यों न हो व्यथित कथित का हो सामना
स्वयं को बांधकर अभिलाषाएं बांटकर गतिशील कहो क्यों न करूं में फिर बंधनों का मर्दना सत्य हो तुम शिष्ट हो पर एक परिशिष्ट हो कहो क्यों न नव पृष्ठ रचूं लेकर प्रखर रचना
कठिन नहीं शब्द हैं भाव भी नहीं हैं स्तब्ध कहो फिर क्यों न गढूं शब्द निहित अभ्यर्थना बोलती ही तुम कितनी संतुलन के बाद भी उन्मुक्त जीवन के लिए निर्मुक्त हो जीवन व्यंजना।
प्रकृति माँ के प्रति सुंदर प्रार्थना
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