भावनाओं के पुष्पों से, हर मन है सिजता अभिव्यक्ति की डोर पर, हर मन है निजता शब्दों की अमराई में, भावों की तरूणाई है दिल की लिखी रूबाई में,एक तड़पन है निज़ता।
एक काया अपनी सलवटों में भर स्वप्न
जीवन क्या है समझने का करती यत्न
झंझावातों में बजाती है नवऋतु झांझर
अपने सुख-दुख भेदती रहती है निमग्न
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