शनिवार, 29 नवंबर 2025

 एक काया अपनी सलवटों में भर स्वप्न

जीवन क्या है समझने का करती यत्न

झंझावातों में बजाती है नवऋतु झांझर

अपने सुख-दुख भेदती रहती है निमग्न




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